मंगलवार, 8 जून 2021

वैश्‍वीकरण में पेड

 


वैश्‍वीकरण में पेड

पेड के तने में बसी

मानव की आत्‍मा

टहलीयों में दौडता है,

हरी हरी संपत्‍ती

हर पत्‍ते-पत्‍ते में

फैलाती है सांसें

फुलों में महकता है

आद‍मी का जीवन

पर्वत पहाड तोडकर

अपने को ही काटता है।

पेड पौधे बेलियों को

कुचलता है

वैश्‍वीकरण में

आदमी भविष्‍य को

काटता है आदमी

एक घर के लिए

उजाडता है पूरा वन

वृक्षों को रहने दो

भविष्‍य को न

निगलने दो।

जयवंत ज्ञानेश्‍वर भुजबल,

सह्यादी रेसीडेन्‍सी

सर्वे नंबर 27/1/1/8

कात्रज ,पुणे 411046 


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें